तथागत के ननिहाल को सियासी दलों ने भुला दिया, नहीं बना पर्यटन स्थल

भगवान बुद्ध की निर्वाणस्थली कुशीनगर की पूरे विश्व में पहचान है।

भगवान बुद्ध की निर्वाणस्थली कुशीनगर की पूरे विश्व में पहचान है। जन्मस्थली लुंबिनी और क्रीड़ास्थली कपिलवस्तु भी पर्यटन नक्शे पर स्थापित है लेकिन उनके बचपन का साक्षी रहा देवदह अपनी प्रमाणिकता का मोहताज है। बौद्ध सर्किट की इस अहम कड़ी को इतिहासकार और पुरातत्वविदों ने नौतनवा तहसील के बनरसिया कला और बनरसिया खुर्द के रूप में चिह्नित किया। इसके बाद प्रमाणिकता के लिए न तो सरकारों ने रुचि ली और न ली यह कभी मुद्दा बनता है। 

भगवान बुद्ध पर लंबे समय से काम करने वाले डॉ. विजय कुमार कहते हैं कि तथागत की ननिहाल के रूप में देवदह के प्रमाणिक होने से सीमावर्ती जिला पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर तेजी से उभरेगा। बौद्ध सर्किट से भी जुड़ जाएगा। इससे विदेशी सैलानी आएंगे और विकास को नई गति मिलेगी।
डॉ. विजय कहते हैं -ठूठीबारी से उज्जैनी तक का क्षेत्र बौद्धकालीन इतिहास के लिहाज से अहम है। यहां देवदह, रामग्राम, कुंवरवर्ती स्तूप, पिप्पलिवन हैं। देवदह (बनरसिया कला और बनरसिया खुर्द) में 1978 में पुरातत्व विभाग ने 88.8 एकड़ भूमि संरक्षित कर किसी भी प्रकार के निर्माण और खनन पर रोक लगा दी। 1991 में पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग की पटना इकाई ने आंशिक खनन कराया। रिपोर्ट में टीम ने स्तूप को गुप्त काल से पहले का बताया। 

असल में देवदह गौतम बुद्ध की मां महामाया, मौसी महाप्रजापति गौतमी और पत्नी यशोधरा की जन्मस्थली भी है। देवदह और रामग्राम की पहचान पर काम करने वाले डॉ. परशुराम गुप्त बताते हैं कि सम्राट हर्ष के शासन काल में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों का भ्रमण किया था। वह देवदह भी आया। अपने यात्रा वृतांत में उसने यहां का जिक्र भी किया।
यह तथ्य देवदेह की पहचान को मजबूत करते हैं : पाली विवरणों में कपिलवस्तु से देवदह की दूरी पांच योजन बताई गई है। चीनी यात्री फाह्यान व ह्वेनसांग ने देवदह की दिशा क्रीड़ास्थली कपिलवस्तु के पूरब बताई है। 

वर्ष 1992 में खुदाई में भी मिले प्रमाण
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की पटना इकाई के प्रोफेसर लाल सिंह के निर्देशन में टीलों की खुदाई की गई। तब गजलक्ष्मी की मिट्टी की मूर्ति, भगवान बुद्ध की खंडित मूर्तियां, टेराकोटा के शिवलिंग सहित तमाम अवशेष प्राप्त हुए थे लेकिन खुदाई कुछ दिन बाद ही बंद कर दी गई।
प्रोफेसर दयानाथ त्रिपाठी, डॉ. शिवाजी सिंह, डॉ. कृष्णा नन्द त्रिपाठी, शैलनाथ चतुर्वेदी, पूर्व कुलपति विशंभर शरण पाठक, सीडी चटर्जी सहित अन्य इतिहासकारों व पुरातत्वविदों ने भी इस स्थान का दौरा किया और स्वयं के अध्ययन व चीनी यात्रियों के विवरण के आधार पर देवदह होने की वकालत की। 
त्रिपिटिकाचार्य ने खुदाई की हिमायत की
अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ भारत के पदाधिकारी त्रिपिटिकाचार्य देवधारी उपाध्याय उर्फ भिक्षु बुद्ध मित्र का कहना था कि अब तक की सभी खुदाई चीनी यात्रियों की भारतीय यात्रा विवरण के आधार पर ही की गईं हैं। फाह्यान और ह्वेंगसांग के दर्शाए गए दिशा व दूरी के आधार पर बनरसियां कला का संरक्षित स्थान देवदह प्रमाणित होता है। खुदाई करा कर स्पष्ट करना चाहिए लेकिन इस पर जिम्मेदार चुप हैं। 

भगवान बुद्ध की यादें यहां भी
महराजगंज में भगवान बुद्ध से जुड़े देवदह, रामग्राम, कुंवरवर्ती स्तूप, पिप्पलिवन हैं। रामग्राम बौद्ध युगीन कोलिय जनपद की राजधानी थी, जहां भगवान बुद्ध के निर्वाण के बाद उनकी अस्थियों के आठवें भाग पर एक धातु स्तूप निर्मित किया गया। आज भी इसे चिह्नित नहीं किया जा सका है। एक और अहम स्थल है कुंवरवर्ती स्तूप। यहां गृहत्याग के बाद भगवान बुद्ध ने अपने राजसी वस्त्र को त्याग कर संन्यास धारण किया था।  

Source :- www.livehindustan.com

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