वसंत पंचमी की बात चले और सरस्वती पुत्र निराला की याद न आए, यह संभव नहीं।
वसंत पंचमी की बात चले और सरस्वती पुत्र निराला की याद न आए, यह संभव नहीं। ‘वर दे वीणा वादिनी’ का महाघोष करने वाला यह महाकवि इसी दिन इस धरती पर जन्मा और अपनी अमर वाणी से हिंदी कविता में अमर हो गया। उनकी रचनाओं में जहां वसंत का उल्लास है तो ‘सरोज स्मृति’ की पीड़ा भी। वसंत के कुछ पहले ही चीनी सेना का भारत पर आक्रमण हुआ था और निराला ‘तुलसीदास’ से होते हुए ‘राम की शक्तिपूजा’ तक जा पहुंचे थे। निराला को याद करते हुए डॉ. धर्मवीर भारती का लेख, निराला की चुनिंदा कविताएं और उनसे जुड़ा एक किस्सा
नीम के पत्ते पियराने लगे होंगे, आम मोजरा गए होंगे, आसपास की बस्ती में ग्रामवधुओं ने वसंत की पियरी रंग ली होगी। कछार की रेती में गंगास्नान के गीत गूंज उठे होंगे। वर्षों बाद इस बार फिर प्रयाग में साहित्यकार संसद के प्रांगण में चहल-पहल होगी। देश के कोने-कोने से लेखक जुटे होंगे, लेकिन खाली पड़ी होगी नीम तले की वह पत्थर की बेंच, जिस पर निराला बैठा करते थे। चहल-पहल के बावजूद खाली-खाली लगेगा वह आंगन जहां वे टहल-टहलकर सोचा करते थे, गुनगुनाया करते थे।
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क्या सोचा था शरद की गंगा-सी पुण्य-सलिला ममतामयी महादेवीजी ने जब उन्होंने संसद के तत्वावधान में देशभर के लेखकों को बुलाया, राष्ट्र के वर्तमान संकट पर विचार करने के लिए, निराला के जन्म-दिवस के अवसर पर वसंत पंचमी के दिन!
आज अगर निराला होते! नहीं, संघर्षों से थक-थककर जिन्होंने शब्दों को निर्बंध छोड़ दिया था, वे अस्तकाल के निराला नहीं, आज अगर वे निराला होते—‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘तुलसीदास’ के निराला, प्रखर विवेकवाले—तीक्ष्ण दृष्टिवाले—बिना किसी समझौते के मुंहफट सच कहनेवाले निराला, तो आज वे क्या कहते? उन्होंने कभी पूजा के समर्पण-भरे क्षणों में संपूर्ण आस्था से कहा था— ‘तुम तुंग हिमालयशृंग और मैं चंचलगति सुर-सरिता’, लेकिन आज वे जानते कि चंचलगति सुरसरिता का स्रोत जहां था वह आराध्य का प्रतीक तुंग हिमालयशृंग आज किसी साम्राज्य-लोलुप विजेता के आक्रमण से पददलित हो चुका है तो!
अब से चार महीने पहले जब यह खबर आई थी कि चीनी सेनाओं ने हम पर हमला बोल दिया है, तो सबके चेहरों पर एक आहत विस्मय था, दुखभरा क्रोध था ओर साथ-ही-साथ एक ऐसी भावना थी जिसे किंकर्तव्यविमूढ़ता कहते हैं। लेकिन ध्यान रखिए कि यह भावना साधारण जन के चेहरे पर नहीं थी। जिनकी बुद्धि को हम बहुधा सामान्य मानते हैं, अपने से कुछ कम विकसित—वह साधारण जन उस क्षण में पूर्णत: सचेत था। किंकर्तव्यविमूढ़ तो हम थे—हम बुद्धिजीवी—जो प्रखर बुद्धि पर गर्व करते हैं, जो भविष्य को चीरकर आगे देख पाने का दावा करते हुए अपने को कवि कहते हैं, दृष्टा कहते हैं। वह अजीब-सी उलझन और विमूढ़ता हमारे चेहरे पर सबसे गहरी स्याही में लिखी हुई थी। क्योंकि साधारण जन ने तो ‘भाई-भाई’ के नारे हमारे कहने पर लगाए थे—यह तो हम थे देश के बुद्धिजीवी और लेखक—जिन्होंने दस-बारह साल से चीन की यश-दुंदुभी बजाई थी। जिन्हें हिमालय के दक्षिण में सब कुछ खराब लगने लगा था और हिमालय के उत्तर में सब कुछ श्रेष्ठ, अद्वितीय। जिनकी इतिहास की समझ इतनी बारीक थी कि भारतीय जनतंत्र का महान प्रयोग जिन्हें जरा भी नहीं छू पाता था, मगर चीनी कम्युनिस्टों का हूफान ओर वूफान सुनकर जिनकी काव्य-धारा में तूफान उठ आया था।
मैं जब यह सोचता हूं तो पाता हूं कि इस ग्लानि का जितना भी भाग किसी दूसरे का हो सकता है वह मेरा भी है।
आज गंगा के तट पर लेखक और बुद्धिजीवी पुन: एकत्र हो रहे हैं महादेवी के आह्वान पर जिनमें सत्य की खोज का वह बौद्धिक साहस रहा है कि उन्होंने कहा था— ‘पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला।’ वसंत पंचमी की वेला में याद आनी स्वाभाविक है उन निराला की जिनके राम सत्य के सेनानी थे, किंतु उस क्षण उन्हें कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। पर निराला ने कहा था—
‘वह एक और मन रहा राम का जो न थका, जो नहीं जानता दैन्य नहीं जानता विनय…’
राम का वह मन हर लेखक और बुद्धिजीवी में जाग्रत रहे। चाहे वह पहले कितना ही भटका हो, पर फिर वह निराला के नायक की तरह महसूस करे कि वह थका नहीं है। इस संकट की वेला में जब एक तानाशाही ने हमारी प्रजातंत्रात्मक भारतीय जीवन-पद्धति पर आक्रमण किया है, तब हम बुद्धिजीवी अपने मोर्चे पर सजग हैं, सतर्क और सावधान हैं और राम की शक्तिपूजा का वह आशीर्वाद हमारे साथ है।
‘जय होगी, जय होगी निश्चय।’
जब नेहरू ने अपनी माला निराला के पैरों में रख दी
महाकवि निराला के इतने किस्से हैं कि वे जीते-जी मिथक बन चुके थे। प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू उनके मित्र थे और अक्सर उनका हाल-चाल लेते रहते थे। यही नहीं, महादेवीजी के जरिये उन्होंने उनकी आर्थिक मदद की भी व्यवस्था कराई थी। एक बार की बात है। नेहरूजी चीन की यात्रा से लौटे थे। गृहनगर इलाहाबाद में उनकी जनसभा थी। स्वागत में गले में पड़ रही मालाओं के बीच उनकी नजर सामने की पंक्ति में बैठे कविवर निराला पर पड़ी। निराला उस समय अखाड़े से पहलवानी कर के आए थे। उनका शरीर मिट्टी और तेल से सना हुआ था। शरीर पर मात्र एक गमछा था। नेहरू ने बोलना शुरू किया कि मैं चीन गया था। वहां मैंने एक महान राजा की कहानी सुनी। राजा के दो बेटे थे। एक कुछ कमअक्ल और दूसरा बेहद बुद्धिमान। बच्चे जब बड़े हुए तो राजा ने दोनों को बुलाकर कमअक्ल लड़के से कहा कि तुम राजपाट संभालो क्योंकि तुम केवल यही कर सकते हो। बुद्धिमान और अक्लमंद लड़के से राजा ने कहा कि यह एक बड़े और महान कार्य के लिए पैदा हुआ है। यह कवि बनेगा। यह कहकर नेहरू ने अपने गले की मालाएं उतारीं और मंच से नीचे आकर निराला के पैरों में सम्मान स्वरूप रख दीं। यह देखकर पूरी सभा स्तब्ध रह गई।
कुछ कविताएं
अभी न होगा मेरा अंत
अभी न होगा मेरा अंत
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे मन में मृदुल वसंत
अभी न होगा मेरा अंत
हरे-हरे ये पात,
डालियां, कलियां कोमल गात!
मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेरूंगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर
पुष्प-पुष्प से तंद्रालस लालसा खींच लूंगा मैं,
अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूंगा मैं,
द्वार दिखा दूंगा फिर उनको
है मेरे वे जहां अनंत-
अभी न होगा मेरा अंत।
मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,
इसमें कहां मृत्यु?
है जीवन ही जीवन
अभी पड़ा है आगे सारा यौवन
स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,
मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बंधु, दिगंत,
अभी न होगा मेरा अंत।
वर दे, वीणावादिनी वर दे!
वर दे, वीणावादिनी वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे!
काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर,
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे!
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मंद्ररव,
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे!
वर दे वीणावादिनी वर दे।
बांधो न नाव इस ठांव, बंधु!
बांधो न नाव इस ठांव, बंधु!
पूछेगा सारा गांव बंधु!
यह घाट वही जिसपर हंसकर,
वह कभी नहाती थी धंसकर
आंखें रह जाती थीं फंसकर
कांपते थे दोनों पांव बंधु!
वह हंसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबके दांव, बंधु!
(कहनी अनकहनी, भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित)
