इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ रहे अमिताभ बच्चन को उनके विपक्षियों ने राजनीति में जीरो करार दिया था। तब अमिताभ का सौम्य उत्तर होता था, जीरो के पास सिर्फ आगे बढ़ने का अवसर होता है। प्रियंका भले राजनीति में जीरो नहीं लेकिन उन्हें अभी तक चुनावी राजनीति की कसौटी पर कसा नहीं गया है।
प्रियंका ने खुद को अमेठी और रायबरेली में प्रचार तक सीमित रखा है। हालांकि वह मुश्किल काम नहीं था क्योंकि रायबरेली इंदिरा की परंपरागत सीट थी और अमेठी उनके चाचा संजय, पिता राजीव गांधी और मां सोनिया गांधी की। इसके बावजूद उनका जादू लोकसभा चुनाव तक ही सीमित होता था। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के उम्मीदवार हारते रहे हैं।
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2017 के चुनाव में अमेठी, रायबरेली की दस विधानसभा सीटों में कांग्रेस को केवल एक मिली थी। रायबरेली विधानसभा सीट से अदिति सिंह अपने बल पर जीती थीं न कि गांधी परिवार के करिश्मे से। ऐसा ही 2012 के चुनाव में भी हुआ। तब अमेठी से प्रियंका के सघन प्रचार के बावजूद अमेठी राजघराने की अमिता सिंह को सपा के गायत्री प्रसाद प्रजापति से हारना पड़ा था।
यह है लाभ
प्रिंयका की शक्ल-सूरत दादी इंदिरा गांधी से मिलती है। दक्षिण भारत और यूपी के ग्रामीण अंचल के कुछ भागों में अभी भी कांग्रेस को इंदिरा गांधी की पार्टी माना जाता है। अमेठी और रायबरेली के बाहर उन्हें कम लोग जानते हैं इसलिए उन पर राजनीतिक और निजी प्रहार कम होंगे।
यह है नुकसान
प्रियंका के लिए सबसे बड़ा बोझ पति राबर्ट वाड्रा पर लगे जमीन घोटाले के आरोप हैं। उनके खिलाफ लगभग दो दर्जन मामलों में सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय जांच कर रहा है। इन मामलों को लेकर प्रियंका के खिलाफ सियासी हमला हो सकता है।
क्या होगा आगे
माना जा रहा है कि चुनाव के मद्देनजर जांच एजेंसियां वाड्रा के खिलाफ गिरफ्तारी जैसी कड़ी कार्रवाई नहीं करेगी क्योंकि इसे प्रियंका के राजनीति में पदार्पण से जोड़कर देखा जा सकता है और इससे कांग्रेस को सहानुभूति मिल सकती है।
