जब महात्मा गांधी ने त्यागे वस्त्र और बन गए ‘फकीर’, पढ़ें यह दिलचस्प वाकया…

महात्मा गांधी ने आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई में तमिलनाडु में कुछ महत्वपूर्ण फैसले लिए थे

महात्मा गांधी ने आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई में तमिलनाडु में कुछ महत्वपूर्ण फैसले लिए थे, जिसमें 98 साल पहले ‘अर्धनग्न फकीर’ बनना भी शामिल है। अराजकतावादी और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम, जिसे रौलेट एक्ट भी कहते हैं, के खिलाफ हड़ताल का विचार महात्मा गांधी को के मन में तब आया जब वह 1919 में तमिलनाडु में सी. राजगोपालाचारी के निवास पर रुके थे। 

लेकिन दो साल बाद, 1921 में मंदिरों के शहर मदुरै में गांधी ने अपनी शर्ट और टोपी का त्याग कर खादी की धोती और एक शॉल के साथ जिंदगी बिताने का कठोर फैसला किया।  वह भी उस भूमि में, जहां एक कहावत है कि ‘आल पाथि, आदै पाथि’ अथार्त किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का पचास प्रतिशत हिस्सा उसके कपड़ों से परिलक्षित होता है। 

लेकिन गांधी ने अपने फैसले के साथ एक अलग अर्थ दिया -एक अर्धनग्न- आधा तन ढंका इंसान। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विंस्टल चर्चिल ने गांधी के कपड़ों को देखर उन्हें अधनंगा फकीर तक कह डाला था।  इतिहास यह है कि 1920  में गांधी ने खादी से बने कपड़े पहनने का फैसला किया और स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार शुरू किया।

स्वतंत्रता आंदोलन के हिस्से के रूप में सार्वजनिक स्थानों पर विदेशी कपड़े जलाए गए थे। अगले साल गांधी ने मदुरै की यात्रा की और पश्चिम मासी स्ट्रीट में रामजी कल्याणजी, मदुरै के निवास पर ठहरने का फैसला किया।

मद्रास (अब चेन्नई) से मदुरै तक ट्रेन में यात्रा करते हुए, गांधी ने लोगों को विदेशी कपड़े पहने हुए देखा। उनके साथ बात करने से उन्हें यह अहसास हुआ कि गरीब खादी का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं और इसलिए वे ‘विदेशी’ मैटेरियल से बने कपड़े नहीं जला सकते।

गांधी ने मदुरै तक की अपनी ट्रेन यात्रा को याद करते हुए कहा, “मैंने अपने डिब्बे में भीड़ देखी, जिसे इसकी कोई चिंता नहीं थी कि क्या हुआ था। लगभग हर कोई विदेशी कपड़े में था। मैंने उनमें से कुछ के साथ बातचीत की और खादी पहनने के लिए निवेदन किया। उन्होंने कहा कि ‘हम खादी खरीदने के लिए बहुत गरीब हैं, यह बहुत महंगी है।’ मुझे टिप्पणी के पीछे की सच्चाई का एहसास हुआ। मैंने बनियान, टोपी और पूरी धोती पहन रखी थी।”

उन्होंने कहा था, “ये बस आधी सच्चाई थी, लाखों पुरुष महज चार इंच चौड़े और लगभग कई फुट लंबे लंगोटी पहन कर अधनंगी हालत में रहते थे, मैं उन्हें क्या प्रभावी जवाब दे सकता था, जब तक कि खुद पर से हर इंच के कपड़े को हटा नहीं देता और गरीब तबके से जोड़ नहीं लेता और यह मैंने अगली सुबह मदुरै बैठक के बाद किया।”

22 सितंबर, 1921 को गांधी ने अपनी पोशाक बदलकर बस धोती और शॉल में रहने का फैसला किया। जिस स्थान पर उन्होंने पहली बार अपने नए परिधान में लोगों को संबोधित किया, उसे मदुरै में ‘गांधी पोटल’ कहा जाता है। गांधी अपने जीवनकाल में पांच बार मदुरै आए थे। अपनी अंतिम यात्रा के दौरान, वह 4 फरवरी, 1946 को हरिजन/दलितों के साथ प्रसिद्ध मीनाक्षी अम्मन मंदिर गए थे।

जबकि हिंदी 196० के दशक से तमिलनाडु की राजनीति में एक मुश्किल विषय माना जाता था, यह गांधी थे, जिन्होंने यहां 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (डीबीएसपीएस) की स्थापना की थी। इसे स्वतंत्रता आंदोलन के एक भाग के तौर पर राष्ट्रीय भाषा के रूप में एक भारतीय भाषा और लोगों को एकजुट करने के लिए स्थापित किया गया था।

डीबीएचपीएस का उद्देश्य दक्षिणी राज्यों में हिंदी का प्रचार करना था। प्रथम प्रचारक गांधी के अपने पुत्र देवदास गांधी थे। बापू के लिए, उनके तमिलनाडु से संबंध तब और मजबूत हो गए, जब उनके बेटे देवदास गांधी ने राजाजी की बेटी लक्ष्मी से शादी कर ली। यहां तक कि जब गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे, तो एक 16 वषीर्य किशोरी थिलायडी वल्लियामई ने उन्हें ‘सत्याग्रही’ के रूप में प्रेरित किया था।

थिलायडी का जन्म दक्षिण अफ्रीका में एक अप्रवासी दंपति आर. मुनुस्वामी मुदलियार और मंगलम के यहां हुआ था, जिनकी जड़े तमिलनाडु से जुड़ी थीं। थिलायडी तमिलनाडु के नागापट्टिनम जिले में है। 1915 में गांधी ने थिलायडी का दौरा किया था।

Source :- https://www.livehindustan.com

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