राफेल सौदे की सुनवाई में नए दस्तावेजों पर विचार करने का निर्णय लेने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने प्रेस की स्वतंत्रता की बात को भी दोहराया।
राफेल सौदे की सुनवाई में नए दस्तावेजों पर विचार करने का निर्णय लेने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने प्रेस की स्वतंत्रता की बात को भी दोहराया। बुधवार को कोर्ट ने कहा कि ना तो संसद द्वारा बनाया कोई कानून और ना ही ब्रिटिशराज में बना सरकारी गोपनीय कानून मीडिया को कोई गोपनीय दस्तावेज प्रकाशित करने से रोक सकता है। साथ ही कोर्ट को भी गोपनीय दस्तावेजों पर विचार करने से नहीं रोक सकता है।
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मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगई और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने अपने इस फैसले में कहा कि वर्ष 1950 से सुप्रीम कोर्ट लगातार प्रेस की आजादी की बात करता रहा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो गोपनीय दस्तावेजों को प्रकाशित करने पर रोक लगाता हो। साथ ही ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो ऐसे दस्तावेजों को अदालत में पेश करने पर रोक लगाता हो।
उन्होंने कहा है, हमारी जानकारी में आपराधिक गोपनीय कानून या किसी अन्य कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसमें संसद द्वारा कार्यकारी अधिकार के तहत गोपनीय दस्तावेजों को प्रकाशित करने पर रोक लगाया गया हो।
फैसले में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के 1971 के फैसले के तथ्य पर ध्यान दिया, जिसमें पेंटागन दस्तावेजों के प्रकाशन पर रोक लगाने के सरकार के अधिकार को मान्यता देने से इनकार किया गया था। गोगोई ने कहा कि हमें ऐसा कुछ नहीं दिखता कि कैसे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का वो निर्णय आज के समय में (राफेल मामले) में लागू नहीं होता।
न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई की। जिसमें मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एसके कौल और केएम जोसेफ शामिल थे। अदालत ने एक मत से कहा कि जो दस्तावेज सार्वजनिक हो गए हैं उसके आधार पर हम याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हैं।
अदालत का कहना है कि जो कागज अदालत में रखे गए हैं वह मान्य हैं। सरकार ने इन दस्तावेजों पर अपना विशेषाधिकार जताते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता ने इन्हें अवैध तरीके से हासिल किया है।
Source :- www.amarujala.com






